Saturday, 16 April 2016

मानव और संचार का विकास


पाषाणकाल के इतिहास को पढ़ने पर यह पता चलता है कि मानव अपनी आवश्यकताओं के लिए ही जीव जन्तुओ का 
शिकार करना सीखा, आग जलाना सीखा और तरह तरह के चिन्हों के माध्यम से दुसरे के भावों को समझना सीखा, ये चिन्ह एक माध्यम थे जिससे एक दुसरे के बातों, संवेदनाओं, और दुःख दर्द, ख़ुशी इत्यादि को मानव समझने की लगातार कोशिश करता रहा| हड़प्पा,  मोहन-जोदारो , कालीबंग,भीमबेटका, आदि गुफाओं के भित्तिचित्रो के अध्ययन से हमें ज्ञात होता है की मानव के विकास के साथ ही साथ संचार का विकास भी अनेक माध्यम से हुआ है | संचार के इतिहास को क्रमबद्ध तरीके से विकास के सोपान की तरफ आगे बढ़ने की प्रक्रिया को हम प्रागैतिहासिक काल से आरम्भ होता देख सकते है। संचार के अन्तर्गत विचार-विनिमय से लेकर शास्त्रार्थ एवं जनसंचार  (mass communication)
 सब आते हैं। कोई २००,००० वर्ष पूर्व मानव-वाणी के प्रादुर्भाव के साथ मानव संचार में एक क्रान्ति आयी थी। लगभग ३०,००० वर्ष पूर्व प्रतीकों का विकास हुआ एवं लगभग ७००० ईसापूर्व लिपि और लेखन का विकास हुआ। इनकी तुलना में पिछली कुछ शताब्दियों में ही दूर संचार के क्षेत्र में बहुत अधिक विकास हुआ है।

भाषा के विकास से पहले चित्रलिपि के विकास की अवधारणा को समझना बहुत जरुरी है |

चित्रलिपि, ऐसी लिपि को कहा जाता है जिसमें ध्वनि प्रकट करने वाली अक्षरमाला की बजाए अर्थ प्रकट करने वाले  भावचित्र (Ideogram) होते हैं। यह भावचित्र ऐसे  चित्रलेख चिह्न होते हैं जो कोई विचार   अवधारणा (Concept) व्यक्त करें। कुछ भावचित्र ऐसे होते हैं कि वह किसी चीज़ को ऐसे दर्शाते हैं कि उस भावचित्र से अपरिचित व्यक्ति भी उसका अर्थ पहचान सकता है, मसलन 'छाते' के लिए छाता का चिह्न जिसे ऐसा कोई भी व्यक्ति पहचान सकता है जिसने छाता देखा हो। इसके विपरीत कुछ भावचित्रों का अर्थ केवल उनसे परिचित व्यक्ति ही पहचान पाते हैं, मसलन '' का चिह्न 'ईश्वर' या 'धर्म' की अवधारणा व्यक्त करता है और '' का चिह्न आठ की संख्या की अवधारणा व्यक्त करता है। चीनी और जापानी भाषा की लिपि और प्राचीन मिस्र की लिपि वर्तमान समय में ऐसी चित्रलिपियों के उदाहरण हैं। 

जापान में यह भावचित्र 'पानी' का अर्थ देता है 



भारत का स्वस्तिक भावचित्र 'शुभ' का अर्थ देता है


आज भाषा के जिस रूप और चिन्ह के माध्यम से हम संचार करते है उसके सतत विकास की प्रक्रिया अनवरत चलती आ रही है जिसको हम हिन्दी, अंग्रेजी , जापानी , तुर्की, उर्दू , चीनी , रुसी , इत्यादि भाषाओँ के रूप में पहचान रहे और वर्तमान परिवेश में संचार की प्रक्रिया को गति दे रहे हैं | आज विकास के सोपान में हम इतना आगे आ चुके है की खुद अपनी बोली, भाषा विकसित करने में सक्षम हो चुके है | अनेक तरह के कोड , चित्र इत्यादि जो अलग अलग क्षेत्र में उपयोग में लाया जा रहा है जैसे मशीन की भाषा, रोबोट की भाषा, रेडियोतरंग के माध्यम से अंतरिक्ष में की जाने वाले संचार की भाषा इत्यादि |

अपनी आवश्यकता के अनुरूप अपनी भाषा और बोली को भी हम विकसित कर सकते है | परन्तु “ आवश्यकता अविष्कार की जननी है” की अवधारणा, मनुष्य के अंत के साथ ही ख़त्म होगी , और संचार का विकास मनुष्य के विकास के साथ ही आगे बढता रहेगा |


लेखक विन्ध्या सिंह -‘पी आर प्रोफेशनल्स’

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