Saturday, 28 May 2016

सम्मान ही सबसे ख़तरनाक चीज़ है आपके जिंदगी में

यह एक ऐसा विचार हैं जिससे हर कोई शायद ही सहमत हो | खैर, वाद विवाद या पक्ष विपक्ष के बिना किसी भी विषय को आप उसके उदेश्य तक नहीं पहुचा सकते है | मन में आई हुई एक बात को हुबहू उसी रूप में दूसरों को समझाना भी एक कला हैं |

हम सब प्रसिद्ध होना चाहते हैं , और जब हम उस रास्ते पर आते हैं तो अपनी आज़ादी खो देते हैं ‘ | कहने को तो यह एक वाक्य हैं लेकिन आप अगर इसकी गहराई को नापेंगे तो शायद इसे सबसे ज्यादा अच्छे से समझ सकेंगें | भारत ने दुनिया को काफ़ी कुछ दिया है जीरो से लेकर गूगल के CEO तक पर गुरु ! हम सब एक जगह आकर अटक जाते हैं... | आज भी अगर कोई पूछ देता हैं की दुनिया के महान दार्शनिकों के नाम बताओ तो हम सब बिना देर किये बचपन में पढ़े हुए या फिर दूसरी भाषा में रटे-रटाये बातों को उगलते हुए अरस्तू, रूसो, प्लेटो इत्यादि का नाम लेने लगते हैं (यहाँ आपको बता दे की जो भी पाठक इस नाम से भी रूबरू नहीं हैं वो गूगल देवता के शरण में जा सकते हैं...) | हमे उस वक़्त अपने देश के महान दार्शनिक ओशोका नाम नहीं आता | जानते हैं क्यू ? वो इसलिए क्योकि उनकी संभोग से समाधि तक’  बचपन में स्कूल की क्लास में छिपाकर पढ़ी और तब यही बताया गया था की ऐसी किताबें अश्लील होती है, वही मानसिकता बनी है, इसलिए ओशो खारिज | मैं ओशो का समर्थक नहीं हूँ | ऐसे न जाने कितने उदाहरण पड़े हुए हैं जो हमें गुलाम बनाने को मजबूर करते हैं | निचे कुछ टुकडो में ये समझाने की कोशिश कर रहा हूँ की कैसे हम इस जकड़न में फसते हैं और क्या हैं इसके मुख्य कारण |

ü  प्यार और सम्मान : यह एक ऐसी लत हैं जो आपके बुराइयों को छिपाता हैं | असली नैतिकता वहां होती है जहां प्रेम होता है, वहां कुछ भी करो , आप नैतिक रूप से सही होंगे | कई बार आपको इसकी लत लग जाने से आप असली और नकली में फर्क करना भूल जाते हैं |

ü  पसंद नापसंद : किसी चीज को नकारना या अपनाना आपके निर्णायक शख़्सियत को दर्शाता हैं | चीजों को देखते ही पसंद या नापसंद का खयाल ख्याल नहीं लाना चाहिए | बस देखो और समझो | जिस दिन आप झट से राय बनाने की मानसिकता से छूट जाएंगे, मेरी मानिये उसी दिन से आप असली वाले महान बन जायेंगे, एक कंप्लीट इंसान |

ü  दुःख : भारत में एक अजीब तरह की परंपरा से हमें गुजरना पड़ता हैं ,यह परंपरा हैं दुख में सुख भोगने की या दुसरे शब्दों में दुःख के बाद सुख भोगने की | हमें यह बताया जाता हैं की आपको मानसिक और शारीरिक दुःख-तकलीफ झेलना ही होगा | कोई ये नहीं बताता कि दुख अनिवार्य नहीं है | बल्कि ये जिंदगी का सत्यानाश करने के लिए होता है, ये किसी भी तरह पूर्ण आज़ादी वाला महान नहीं बनाता |

ü  रिश्ते : रिश्ते उस आईने की तरह होता हैं जिसमे हम सब अपने आप को देखने की कोशिश करते हैं | अपनी असलियत रिश्तों में दिखती है, दुनिया की कोई भी चीज ऐसी नहीं है जो किसी से जुड़ी न हो और उसी जुड़ाव को हम रिश्ता कहते हैं |  रिश्तों से भागना संभव नहीं हैं | इन्हीं रिश्तों के कारण हम जिंदगी के सारे रूप को करीब से देखते हैं और समझते हैं


 मौत : इन्सान के अलावां आप अपने आस-पास के जीव जंतु को देखो | सब अपने में मग्न हैं | मौत का हिसाब केवल इन्सान ही रखता हैं | आपके महान होते ही इसका डर भी आपको सताने लगता हैं | जब तक इन्सान मरने के बारे में सोचना नहीं छोड़ेगा तब तक वो जी नहीं सकता है|

          लेखक गौरव गौतम -‘पि. आर प्रोफेशनल्स’

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