Friday, 16 September 2016

बाबाओं का पीआर

अनेक बुद्धिजीवी बाबाओं को गरीयाने का अपना कर्तव्य मान बैठे हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं की बाबाओं के पास बहुत सारे जुगाड़ है, जिसे आप मॉडर्न भाषा में पीआर कह सकते हैं | भारत की जनता हमेशा से संतों, भिक्षुओं, सूफ़ियों, का देश रहा है | ऋषियों की परम्परा बहुत पुरानी रही है | बुद्ध, शंकराचार्य, गांधी, बिनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण,  हर काल-चक्र में भारत की जनता इस तरह के लोगों को सुनती रही है जो नेता बनने का ढोंग नहीं, बल्कि संत-सन्यासी दिखते हों |( आज के दौर की विकृत परिभाषा से अलग जिसमें खुद बाबाओं का भी योगदान है)

बाबा लोंगों के ख़िलाफ़ ढेरों सवाल उठाए जा सकते हैं, सवाल किसी के खिलाफ उठाये जा सकते हैं | लोकतंत्र में यह होना भी चाहिए | भारत जैसे विविधता वाले देश में, गुरू परम्परा होने की वजह से बाबा लोंगों की पुछ हमेशा बरक़रार रहेगी शायद इसे चुनौती भी दिया जाये, तो पत्थर पर सिर मारने वाली बात होगी |

पहले बाबा लोग दुनियादारी से दूर एकांतवाश में भजन-कीर्तन करते हुए आम जनता को अच्छी बातों का प्रवचन देकर अपने नैतिक दायित्वों का निर्वहन करते थे | (आज के दौर में भी ऐसे कुछ लोग मिल सकते हैं) परन्तु टीवी के बढ़ते प्रभाव ने जैसे इनके सेक्टर में भी बूम ला दिया और उसका साथ दिया इन्टरनेट और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने | तरह-तरह के चैनलों के माध्यम से यह बाबा लोग धीरे धीरे लोंगों के घर के अन्दर तक पहुंचें और आज इनके आश्रमों द्वारा बनाये गए जैविक खाद्य पदार्थ लोंगो के रसोई और दैनिक जीवन का हिस्सा बन रहे हैं | ऑनलाइन स्टोर से लेकर रिटेलशॉप तक खुल गए हैं | दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली लगभग प्रत्येक खाद्य सामग्री इन बाबाओं के कम्पनी रूपी आश्रम में बनायीं जा रही हैं,  और स्वदेशी के नाम पर बेची जा रही है |

यह बाबा लोंगों का पीआर ही है जो यह संभव बना रहा है | बिना किसी पीआर एजेंसी (PR Agency)को हायर किये और न ही विशेष विज्ञापन द्वारा, खुद से ही ऐसा जनतंत्र खड़ा कर दिए हैं की उनकी कोई खिलाफत करे तो आस-पास के लोग आपत्ति करने लगते हैं | और शायद मार-पिट पर भी उतारू हो सकते हैं | पीआर का ऐसा नमूना शायद ही देखने को मिले | बाबाओं का पीआर(Public Relations) एक चरणबध्द पीआर का उदहारण है जिससे हम लॉन्गटर्म पीआर और उसके प्रभाव को सीख सकते है, और व्यवसाय के हिसाब से एडिट करके उपयोग में भी ला सकते हैं |


                         लेखिका अमृता राज सिंह, PR Professionals 


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