Monday, 14 November 2016

ब्रांडिग यानि आत्ममुग्धता से आगे की कहानी


ब्रांड, इमेज या छवि। यह शब्द सुनते ही दिमाग में कोका कोला, रालेक्स, अरमानी, गूची की मिलीजुली तस्वीर बनने लगती है। क्या थी वो रणनीति जिसने इन शब्दों को महज एक कंपनी या प्रोडक्ट के नाम से बढकर बहुत बडे ब्रांड में तब्दील कर दिया। अगर भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो रामदेव, अरविंद केजरीवाल, कपिल शर्मा,  नवजोत सिंह सिदधू ऐसे कई नाम हैं जिन्होंने ब्रांड या इमेज की परिभाषा न केवल बखूबी समझा है बल्कि हर किसी ने अपने तरीके से इसको परिभाषित किया और गढा है। हर किसी ने अलग-अलग क्षेत्र में एक मुकाम हासिल किया और और उस मुकाम को पाने के साथ-साथ स्वयं की ब्रांडिग या इमेज को भी एक नए स्तर पर पहुंचाया।

अब सवाल यह है कि किसी भी क्षेत्र में एक मुकाम हासिल करना खुद ब खुद आपकी इमेज बिल्डिंग (Image Building)कर देता है या कोई प्रोडक्ट, सर्विस या कंपनी कैसे उसी क्षेत्र में कार्यरत अन्य प्लेयर्स से अलग अपनी ब्रांडिग का स्रजन करती है। जो कई दशकों तक अभेद रहती है। कैसे एक व्यक्ति, ब्रांड या कंपनी किसी क्राईसिस से गुजरकर भी फिर मार्केट में पुर्नस्थापित हो जाती है। जबकि कई कंपनियां क्राईसिस में उलझकर न केवल हाशिए बल्कि पतन के पहुंच जाती है।

यहां सबसे अहम होता है इमेज, छवि या ब्रांड बिल्डिंग। अगर एक पीआर प्रोफेशनल    (PR Professional) के नजरिए से देखा जाए तो आपका ब्रांड मंत्रा ही आपको बचा सकता है। क्या है यह ब्रांड मंत्रा। अगर सरल शब्दों में कहा जाए तो आप दूसरों की नजर में कैसे दिखना चाहते हो। इसके लिए सबसे पहले अपनी भावनात्मक अपील का चुनाव करना होगा। फिर खुद से कुछ सवाल करने होंगे कि कंपनी या व्यक्ति किस नाम या काम से खुद की पहचान स्थापित करना चाहता है। आम से खास बनने की प्रक्रिया में पहचान या छवि को स्थापित करना लंबी और सतत प्रक्रिया है। यह महज कुछ कामों के प्रचार, अखबारों की सुर्खियों से कहीं आगे की कौडी है। मैगी या रामदेव की रणनीति से हर किसी को सीखने की जरूरत है। यह आत्ममुग्धता से आगे की कहानी है।

                           लेखक दुर्गेश त्रिपाठी PR Professionals 

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